Gustaankhein

लम्बी रात से जब मिली उस की ज़ुल्फ़-ए-दराज़

खुल कर सारी गुत्थियाँ फिर से बन गईं राज़

उस की इक आवाज़ से शरमाया संगीत

सारंगी का सोज़ क्या क्या सितार का साज़

मेरा क़ाइल हो गया ये सारा संसार

रंग-ए-नाज़ में जब मिला मेरा रंग-ए-नियाज़

साज़ों का संगीत क्या पायल की झंकार

कौन सुने इस शोर में दिल तेरी आवाज़

उन आँखों में डाल कर जब आँखें उस रात

मैं डूबा तो मिल गए डूबे हुए जहाज़

अमीक़ हनफ़ी

 

आँखों में जो बात हो गई है

इक शरह-ए-हयात हो गई है

बहुत अजीब है ये क़ुर्बतों की दूरी भी

वो मेरे साथ रहा और मुझे कभी  मिला

भला हम मिले भी तो क्या मिले वही दूरियाँ वही फ़ासले

 कभी हमारे क़दम बढ़े  कभी तुम्हारी झिजक गई

बशीर बद्र

फ़ासले ऐसे कि इक उम्र में तय हो  सकें

क़ुर्बतें ऐसी कि ख़ुद मुझ में जनम है उस का

बाक़र मेहदी

क़ुर्बतें लाख ख़ूब-सूरत हों

दूरियों में भी दिलकशी है अभी

अहमद फ़राज़

फ़ासले ऐसे भी होंगे ये कभी सोचा  था

सामने बैठा था मेरे और वो मेरा  था

हया से सर झुका लेना अदा से मुस्कुरा देना

हसीनों को भी कितना सहल है बिजली गिरा देना

ये तर्ज़ एहसान करने का तुम्हीं को ज़ेब देता है

मरज़ में मुब्तला कर के मरीज़ों को दवा देना

बलाएँ लेते हैं उन की हम उन पर जान देते हैं

ये सौदा दीद के क़ाबिल है क्या लेना है क्या देना

ख़ुदा की याद में महवियत-ए-दिल बादशाही है

मगर आसाँ नहीं है सारी दुनिया को भुला देना

अकबर इलाहाबादी

अपनी सारी काविशों को राएगाँ मैं ने किया

मेरे अंदर जो  था उस को बयाँ मैं ने किया

आज़ाद गुलाटी

तुझ से किस तरह मैं इज़हार-ए-तमन्ना करता

लफ़्ज़ सूझा तो मआ’नी ने बग़ावत कर दी

कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें

इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़-दार में

बहादुर शाह ज़फ़र

क्या ताब क्या मजाल हमारी कि बोसा लें

लब को तुम्हारे लब से मिला कर कहे बग़ैर

बहादुर शाह ज़फ़र

जो उन को लिपटा के गाल चूमा हया से आने लगा पसीना

हुई है बोसों की गर्म भट्टी खिंचे  क्यूँकर शराब-ए-आरिज़

मोहब्बत एक पाकीज़ा अमल है इस लिए शायद

सिमट कर शर्म सारी एक बोसे में चली आई

रुख़्सार पर है रंग-ए-हया का फ़रोग़ आज

बोसे का नाम मैं ने लिया वो निखर गए

हकीम मोहम्मद अजमल ख़ाँ शैदा

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